मुझको भी हक़ है रोशनी का..
सूरज, चाँद सितारों से सजे आसमानों का
उस आसमान में फिर बेबाक उड़ानों का
खुली फ़िज़ाओं कि खुशबु का.
बेचैन, सिसकती अंधियारी गलियों में
कतरा मेरे हिस्से कि ख़ुशी का
तपती रेत भरी राहों में
अपने सपनों को थोड़ी नमी से सजाने का
तेरे झूठे आडम्बरों के आगोश से
अपना खोया वजूद ढूंढ लाने का
अगर हम सच में बदलाव चाहतें हैं तो हमें अपनी ही माँ को, अर्धांगिनी को दोयम दर्जे का इंसान समझने से बचना होगा। ....
Nicely Written!!!
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